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डिजिटल शोषण: जब ‘स्क्रीन टाइम’ प्रगति नहीं, बल्कि समाज का नुकसान बन जाए

डिजिटल शोषण: जब ‘स्क्रीन टाइम’ प्रगति नहीं, बल्कि समाज का नुकसान बन जाए
आज हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ हमारी उंगलियों के एक स्वाइप पर दुनिया सिमट आती है। लेकिन इस सुविधा के पीछे एक अंधेरा सच छिपा है। अक्सर कहा जाता है कि “यदि आप किसी उत्पाद के लिए भुगतान नहीं कर रहे हैं, तो आप स्वयं उत्पाद हैं।” यह बात आज के सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पूरी तरह सटीक बैठती है।
1. सेवा और शोषण के बीच की धुंधली रेखा
किसी भी तकनीक का प्राथमिक उद्देश्य मानवीय जीवन को सरल बनाना और समाज की सेवा करना होना चाहिए। लेकिन जब किसी सिस्टम या ऐप का पूरा ढांचा केवल इस बात पर टिका हो कि उपयोगकर्ता (User) अपनी स्क्रीन से कितनी देर तक चिपका रहता है, तो वह सेवा से बाहर निकल शोषण के दायरे में आ जाता है।
इन प्लेटफॉर्म्स के पीछे काम करने वाले जटिल ‘एल्गोरिदम’ का एकमात्र लक्ष्य ‘अटेंशन इकोनॉमी’ (Attention Economy) पर कब्जा करना है। उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि आप क्या सीख रहे हैं, आपका मानसिक स्वास्थ्य कैसा है; उन्हें बस आपके समय और आपके डेटा की भूख है।
2. ‘डोपामाइन लूप’ का जाल
सोशल मीडिया ऐप्स को मनोवैज्ञानिक रूप से इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे हमारे दिमाग में ‘डोपामाइन’ (खुशी महसूस कराने वाला हार्मोन) रिलीज करते हैं। हर नोटिफिकेशन, हर ‘लाइक’ और हर नया वीडियो हमें एक क्षणिक खुशी देता है, जिससे हम और अधिक समय बिताने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी को जुए की लत लग जाती है।

सच्चाई यह है: एक सिस्टम जो स्क्रीन टाइम बढ़ाने को ही अपनी सफलता मानता है, वह जानबूझकर हमारे आत्म-नियंत्रण को खत्म कर रहा है।

3. समाज पर इसके विनाशकारी प्रभाव
जब स्क्रीन टाइम को प्राथमिकता दी जाती है, तो समाज को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है:
• मानसिक स्वास्थ्य का संकट: युवाओं में बढ़ती एंग्जायटी, डिप्रेशन और अकेलेपन का सीधा संबंध अत्यधिक डिजिटल खपत से पाया गया है।
• संज्ञानात्मक गिरावट (Cognitive Decline): ‘शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट’ (जैसे रील्स और टिक-टॉक) ने हमारी एकाग्रता की क्षमता (Attention Span) को इतना कम कर दिया है कि अब लोग लंबी किताबें पढ़ने या गहरे विषयों पर चर्चा करने में असमर्थ महसूस करते हैं।
• सामाजिक अलगाव: विडंबना देखिए, ‘सोशल’ मीडिया ने हमें समाज से ही अलग कर दिया है। लोग एक ही कमरे में बैठकर एक-दूसरे से बात करने के बजाय अपनी स्क्रीन में डूबे रहते हैं।
4. क्या यह ‘डिजिटल सशक्तिकरण’ है?
अक्सर कंपनियाँ इसे ‘डिजिटल सशक्तिकरण’ या ‘कनेक्टिविटी’ का नाम देती हैं। लेकिन हमें खुद से पूछना चाहिए:
• क्या स्क्रॉलिंग करना सशक्तिकरण है?
• क्या अपनी तुलना अजनबियों की बनावटी जिंदगी से करना कनेक्टिविटी है?
• क्या एल्गोरिदम द्वारा तय की गई जानकारी को बिना सोचे-समझे स्वीकार करना प्रगति है?
यदि कोई सिस्टम आपकी रचनात्मकता छीनकर आपको केवल एक ‘कंज्यूमर’ (उपभोक्ता) बना रहा है, तो वह समाज का निर्माण नहीं, बल्कि उसका पतन है।
5. समाधान: जागरूक उपभोक्ता से जिम्मेदार नागरिक तक
हमें इस शोषणकारी चक्र को तोड़ने की जरूरत है। इसके लिए कुछ कड़े कदम उठाने होंगे:
• डिजिटल डिटॉक्स: तकनीक का उपयोग केवल जरूरत के लिए करें, न कि बोरियत मिटाने के लिए।
• एल्गोरिदम के प्रति जागरूकता: यह समझें कि जो आपको दिखाया जा रहा है, वह आपको ‘व्यस्त’ रखने के लिए है, न कि ‘शिक्षित’ करने के लिए।
• सख्त नियम: सरकारों को ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो कंपनियों को उनके एल्गोरिदम के हानिकारक प्रभावों के लिए जवाबदेह ठहरा सकें।
अंततः प्रौद्योगिकी (Technology) एक बेहतरीन सेवक है, लेकिन एक बहुत ही खतरनाक मालिक है। यदि हम आज अपनी स्क्रीन पर नियंत्रण नहीं कर पाये, तो कल ये सिस्टम हमारे सोचने, समझने और महसूस करने के तरीके को पूरी तरह नियंत्रित कर लेंगे।
याद रखिए, आपका समय आपका जीवन है। इसे उन एल्गोरिदम को न सौंपें जो केवल मुनाफे के लिए बने हैं। समाज की प्रगति स्क्रीन टाइम से नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों की गहराई और वास्तविक ज्ञान से मापी जानी चाहिए।

अर्चना सिंह (नोएडा)

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